Kejriwal
केजरीवाल से हर कोई सहमत हो, जरूरी नहीं।लेकिन
उनका मजाक उड़ाने वाले कौन लोग हैं?
केजरीवाल एक व्यक्ति नहीं, बदलाव का एक
विचार है। थप्पड़ पर ताली बजाने से पहले जरा अपने
गाल देख लें, जहां हर दिन किसी अधिकारी,
अपराधी या ताकतवर की ज्यादतियों के निशान
मिलेंगे। आम आदमी के 'अच्छे दिन'तभी आएंगे, जब
सिस्टम बदलेगा। बदलाव चाहने लोगों की आप मदद
नहीं कर सकते, न करें। लेकिन उनसे नफरत क्यों?
भगत सिंह ने तो आजादी की लड़ाई में धर्म को एक
रोड़ा बताया था, 'मैं नास्तिक क्यों हूं'
जैसा ऐतिहासिक दस्तावेज लिखा था। आज
तालियां बजाने वाले लोग क्या उस वक्त भगत सिंह
को समझने के बजाय खिल्ली उड़ा रहे होते?
अंग्रेजों की ताकत ऐसे ही भारतीय
थे,जो क्रांतिकारियों का साथ देने के बदले
जासूसी करके उन्हें कमजोर करते थे। आज वह काम
नफरत फैलाकर किया जा रहा है। ताज्जुब है
कि जिन नेताओं ने 67 साल से आम
आदमी की जिंदगी नरक बना रखी है, उनके
प्रति इतनी आस्था? और जो आदमी बदलाव चाहता है,
उससे नफरत? भला कल कौन आयेगा इस सिस्टम
को बदलने? केजरीवाल को कुछ बरस जिंदा रहने
का मौका मिल जाये, तो संभव है कि हम'अच्छे
दिन' का सपना बुन सकेंगे। आग्रह सिर्फ यह
कि अच्छाई के साथ खड़े नहीं हो सकते तो बुराई
का साथ भी न दें.
Labels: aap kejrival

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